जीवन एक संघर्ष
थका थका सा क्यूँ है मन अब जीवन के संघर्षों से हताशा दिखती चेहरे पे क्यूँ आश नहीं है जीने की अंधकार के साये से क्यूँ पल पल डरता है मन आश छोड़ दी जीने की क्यूँ रास नहीं आता कोई आश लगे न जीने की जब ध्यान लगा लेना नभ पे कैसे नभ मे उड़ते पंछी मन को हर्षाते हैं नहीं है मानव जीव है लेकिन बहुत हमें सिखला जाते मूक हैं कोई शोर न करते प्रतिक्रिया बहुत कुछ कह जाती नन्हें - नन्हें पंखों से कैसे हवा में उड़ते जाते दिन भर दानों की खोज में रहते कभी नहीं घबराते हैं कभी जो मौसम सख्त हुआ या गरम हवा का झोका हो तो पेड़ की छइयाँ मे रुककर क्या धैर्य दिखाते हैं तिनके मुँह में चुन चुन कर एक गुजर बसर बनाते हैं कभी कड़कती बिजली से या कभी कडक इंसानों से अक्सर उनके अरमानों के घोसले टूट जाते हैं , रोज़ की असफलता और जीवन की कुरूर सत्यत...