हमें ग़मों में खुस रहना नहीं आता
हमें ग़मों में खुस रहना भी तो नहीं आता आंखों में आंसू छिपाना भी तो नहीं आता कैसे रह पाएंगे इस मतलबी दुनियां में हमें तो झूठ को सच बताना भी नहीं आता हमारे ग़मों को सब मेरे चेहरे से बता देते हैं क्यूंकि हमें चेहरे पे चेहरा लगाना भी तो नहीं आता सभी पूछते रहते हैं हमारी उदासी का मतलब क्या करें हमें सच छिपाना भी तो नहीं आता हम सबके फ़िक्र की दुआ करते रहते हैं हमें तो किसी के गम की वजह भी बनना नहीं आता गम किसने कितना दिया मुझे ये पता नहीं हमे ये याद रखना भी तो नहीं आता शायद इसलिए याद करते हैं सभी को इस भीड़ भरी दुनिया में बस कितना किसको याद करते हैं ये जताना नहीं आता ...