एक खूबसूरत एहसास



उसकीआंखों में मैंने क्या कुछ नहीं देखा

सिर्फ आसूं देखे थे मगर वो दिल के जख्म नहीं देखे
वो कहती थी मै तो अवसाद की बीमारी से गुजर रही हूँ
तो कुछ नहीं सब  बहम है कह के टाल दिया करते थे 
एक दिन किसी और से सुना माँ तो अरशों से दवाई पे जीती थी
जरूरत से ज्यादा दवाइयाँ खा के गम को  छुपाती थी
करोड़ो का बंगला था उस घर मे जीने की आशा  थी  
कंबक्त  अपने ही  भवरें की तरह मडरा रहे थे 
गुजर बसर आश नहीं बस कल्पनाओं की जुबानी थी 
एक दिन वृद्धा आश्रम मे छोड़ दिया 
उन एहसासों की बस यादें ही रह गयी
वहाँ कोई अपना न साथी न संगी बस फर्ज़ों की कहानी थी 
जो एहसास चाहिए था वो रास्ते ही अनकहे से  हो गए 
वो रोयी वो बिलखी कोई न समझा एक दिन चुप रहने का ठाना
मगर ऐसे चुप हुई की कभी बोली ही नहीं 
एक दिन औरों से जाना  तो वो गुमनाम रिश्ते  भी आ पहुचे
लेकिन तब बहुत देर हो चुकी थी , वो तो जा चुकी थी 
लेकिन वो इतना नाराज थी सपने मे आई एहसास दिलाने 
लेकिन वो वक्त भी अजीब था  वो मुझे बोल सकती थी 
लेकिन  मुझे बेजुबान करके चली गयी 
तब अहसास हुआ उसकी साँसे जब थी  तो कभी कदर  न हुई |
बस उसकी यादें ही रह गयी, कैसे अवसाद मे रहके भी , 
कैसे घुटती , रोती और मुस्कराती थी  
बच्चों पर, अपनों पर जान छिड़कती थी वो,
सारी हदें पार कर जाती थी  ||
रूठ जाती थी, जो न जाते एक फोन पर हम,
उसे सब रिश्ते चाहिए थे, मगर वो किसी को, नहीं चाहिए थी
मुझसे भी रूठ कर बैठी थी ,मगर मैने न ध्यान दिया
ये ईगो ये घमंड , कभी एक मौका तक न दिया उसको समझने का |
मै आँख भर भर के रोयी , वो गुस्सा इतना थी कि
मिलने तक को भी न रुकी, बहुत याद आती है उस माँ की अब 
उसने मुझे ये हक भी मेरे हिस्से का न दिया
शायद मैंने भी तो उसकी हिस्से की खुशियाँ उसको नहीं दी थी 
अब माँ दुर्गा ही सहारा थी, वो रास्ता मुझको बतलाने की ,
अब तो सपनों मे ही उसका इंतजार रेहता है
लेकिन आसूवों की धारा मै  शून्य सी हो जाती हूँ 
और बस यही कहती हूँ माँ माना की मुझे आने मे देरी हुई
पर तुमको तो रुक जाना था, अब क्या इतना गुस्सा थी ||

ये लेखनी उन सबको समर्पित हैं जो माँ को, और अपनों को तनिक भर भी नहीं समझते जब उनको उनकी सबसे ज्यादा जरूरत हो /इतना भी भाव क्या खाना, जब अपनों का हाथ छूट जाए, और साथ छूट जाए और जिस माँ ने ये खूबसूरत दुनिया देखने का मौका दिया उनके साथ दो वक्त के पल नहीं बिता पाये / और अवसाद (डिप्रेशन ) की बीमारी को हल्के मे न लें ये ऐसे बीमारी है, जिसमे इंसान अंदर ही अंदर टूट के भिखर जाता है/ आज की दुनिया मे चोट जो बाहर से दिखे, उसपे यकीन करते हैं क्यूंकी सब बाहरी दिखावे की दुनिया मे जीते हैं इस वक्त पे जरूरत होती है प्यार की अपनों के एहसास की /

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