संचार बिना शब्दों के
(कीर्ति पाण्डेय)आज मै आप सबको इस बात को परिभासित करना चाहती हूँ कि जिन रिश्तों मे कम शब्दों मे वार्तालाप होती है कहीं न कहीं वह रिश्ता प्राकृतिक है ईश्वर की दी हुई परिकल्पना है / इस प्रकार के संचार में शब्दों का इस्तेमाल कम होता है, ऐसे रिश्ते भावनाओं से ओत - प्रोत होते हैं / ऐसे रिश्ते मे अपनी बात को भावनाओं, के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है / यह एक प्राकृतिक संचार का साधन है। अवाचिक संचार निम्न प्रकार के होते हैं- हंसना, मुस्कुराना, गुस्से से , आंखों से इशारे करना, लड़ाई- झगड़ा इत्यादि /
संचार बिना शब्दों के - जैसे चिड़िया अपने बच्चे के भूख को बिना उसके कहे एहसास करती है और अपनी चोच मे खाने के टुकड़े को भरने के लिए किस हद तक भ्रमण करती है / भले ही जानवर की अपेच्छा इंसान को इस पृथ्वी का सबसे समझदार प्राणी बताया गया है/ लेकिन आज के मानव मे ये बात खतम होती जा रही है /जैसे माँ - जब उसका बच्चा छोटा होता है भले ही बेजुबान उस वक्त होता है लेकिन एहसास माँ समझ जाती है की मेरे बच्चे को किस वक्त किस चीज की जरूरत है/ तो मनुष्य इसी रूप मे अपने को हर रिश्ते के लिए एहसास के जरिये क्यू नहीं समझ पाता ?
मुझे इसका कारण हर रिश्ते के बीच निकटता का अभाव लगता है वही दोस्त वही भाई बहन वही कोई भी सामाजिक रिश्ता क्यूँ शुरुवात मे इतना मधुर होता है बाद मे धीरे- धीरे एक दूसरे पर केवल उँगलियाँ उठाई जाती है / ऐसा क्यू जब दो व्यक्ति आपस मे रिश्ते बनाते है तो उस वक्त दोनों की सोच सूझ बुझ मे समानता होती है और मधुरमय रिश्ते के जिम्मेदार दोनों पच्छ होते हैं /तो ये बात स्वाभाविक है कि रिश्ते मे दूरियाँ बनी तो उसके जिम्मेदार भी दोनों पच्छ हैं, जरूरत है मिल बैठकर आपस मे एक संचार चाहे बिना शब्दों के हि हो, फिर धीरे -धीरे अपने आप निकटता बन जाती हैं लेकिन किसी एक पे उंगली उठाकर गलत कहकर दूर कर देना बिना समझे उसकी भावनाओ को, तो एक तो डिप्रेशन का शिकार हो जाएगा / मैंने इससे पहले अपनी लिखी लेखनी मे "Understanding By Human Emotions" मे ये बात भालीभाती परिभाषित किया था जिसमे लोगों ने हिन्दी मे परिवर्तन करने के लिए कहा तो कुछ व्यक्यांश इसलिए मैने इस लेखनी मे प्रस्तुत किया है/
आजकल कि भाग दौड़ भरे जीवन मे "संचार बिना शब्दों के " ऐसे संचार कि कमी हो गयी है इसलिए आज चाहे भाई बहन का रिश्ता- दोस्ती का रिश्ता - पति पत्नी का रिश्ता -कोई भी रिश्ता हो मजबूत और खरा नहीं है / क्यूंकी लोगों के पास अपने रिश्तों के लिए लंबी बातचीत का वक्त नहीं रहा है जिसके कारण कभी कभी बहुत सी बातें मन मे ही रह जाती हैं और परेशान करती रहती हैं/ तब अपनी बात कहने के लिए दवाव बनाना पड़ता है लेकिन क्या ये सही है की अगर किसी रिश्ते मे दबाव से या भय से एहसास किया जाता है तो वो बहुत कम समय के लिए रिश्ता होता है इसलिए इंसान खुद एहसास करके रिश्तों को समझने की कोशिश करता है तो उस रिश्ते की अवधि लंबी होती है कभी न मिटने वाल रिश्ता होता है /
अपनी इस लेखनी से मै सिर्फ लोगों को ये जागरूक करना चाहती हूँ कि हर कोई सिर्फ अपनी ज़िम्मेदारी का संकल्प ले तो इस देश मे कोई भी व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार नहीं होगा और बिना शब्दों के एक दूसरे को एहसास से समझने की कोशिस करें तो कोई भी रिश्ता मधुर हो सकता है/ ऐसे छोटे छोटे- कोशिस से हम एक नए और विकसित समाज कि स्थापना कर सकते हैं। और समाज को एक नयी दिशा मिल सकती है/
तो आओ मिलकर ये संकल्प ले कि यही सब परिवर्तन हमारी ईश्वरीय पूजा का भाग बन सकता है जिससे ईश्वर सदेव खुस रहेगा/
धन्यवाद /
Comments