*धुँधले रिश्ते*
फासले रिश्तों मे कितनी
दूरियाँ बना देते हैं
मैंने राहों में दिये जलाए
वो आधिंयाँ चला देते हैं
फिर भी अपनों से हमने
मिलना छोड़ा नहीं है
अकेलापन महसूस करती हूँ
कभी ज़रा- ज़रा सा
अपनेपन का धोखा खाती हूँ
कभी खरा-खरा सा
फिर भी अपनों से हमने
मुँह मोड़ा नहीं है
दर्द किस ने कितना दिया है
ये तो सबको याद होगा
मुझे ग़म में डूबा कर उनको
कुछ तो एहसास होगा
फिर भी अपनों से हमने
रिश्ता तोड़ा नहीं है
याद तो करती हूँ सभी को
पर कितना पता नहीं है
मुझे अपनों ने ही ठुकराया
इसमें मेरी खता नहीं है
फिर भी गैंरो से हमने
रिश्ता जोड़ा नहीं है़
कीर्ति पाण्डेय
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