उदास जिंदगी                   

हर पल कोई आसपास है
फिर भी मन घटने लगता है
क्यों कभी-कभी,
जिंदगी उदास-सी हो जाती है?

सब कुछ अंदर ही अंदर
चुपचाप सिमटने लगता है
क्यों कभी-कभी,
रूह बेजान-सी हो जाती है

तनहाई में खुशी मिलती नहीं
ग़म का इजहार होता नहीं
क्यों कभी-कभी,
जुबां बेजुबान हो जाती है

बाँट कर एक-एक खुशी
हर जगह को महकाया मैंने
क्यों कभी-कभी,
जिंदगी सुनसान हो जाती है

हौंसले बड़े हो भी गए तो क्या
मुश्किलें छोटी होती नहीं
क्यों कभी-कभी,
जिंदगी इम्तहान हो जाती है
कीर्ति पाण्डेय 

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